Wednesday, December 10, 2014

Everyone will agree to you after the accomplishment of the mantras

इस महामंत्र की सिद्धि के बाद हर कोई मानेगा आपकी बात

Read full blog आप भी सिद्ध कर सकते हैं “वशीकरण”, जानिए कैसे?
गत लेख में हमने आधुनिक युवाओं की मानसिकता के बारे में चर्चा की थी। चूंकि ये एक सामयिक मुद्दा था और हमने कई युवाओं से इस बारे में बात की थी इसलिए ऐसे मुद्दे को उठाना ज़रूरी था। किंतु आज हम साधना के उन अनुभूत प्रयोगों के बारे में चर्चा करेंगे, जिन पर हमने स्वयं भी रिसर्च किया तथा उन सिद्ध पुरुषों के अनुभवों को देखा जो कई वर्षों से ऐसी साधना में लिप्त हैं और दुनिया की नज़रों से ओझल होकर दुनिया की भलाई के लिए नई-नई सिद्धियां प्राप्त करने में जुटे हैं।

आज से करीब चौदह साल पूर्व हम तांत्रिक साधना के रहस्य को समझने के लिए मणिकर्णिका घाट (वाराणसी) जाते थे। वहां हमारी मुलाकात कुछ ऐसे सिद्ध योगियों से हुई, जिनसे हम प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। हालांकि हमने स्वयं सिद्धि के लिए कोई विचार नहीं किया था फिर भी मन में कई जिज्ञासाएं थीं, जिनकी पुष्टि के लिए रात्रिकाल में श्मशान भूमि पर कदम रखना ही पड़ा।

तत्कालीन समय में स्वामी योगानंद नामक सिद्ध पुरुष से मुलाकात स्मरणीय रहा और उनके साथ कुछ ऐसे अनुभव हुए जो बिल्कुल अलौकिक थे। वशीकरण, सम्मोहन तथा त्राटक का साधारण प्रयोग उनके लिए बाएं हाथ का खेल था। हालांकि इसके अलावा स्वामी जी मारण और स्तम्भन क्रिया के भी विशेषज्ञ थे किंतु हमने उनसे आग्रह किया कि वे केवल वशीकरण, सम्मोहन तथा त्राटक के विषय में ही हमें बताएं।

संयोग से उस समय वहां हमारे साथ हमारे परम मित्र और सिद्ध योगी आत्मानंद भी उपस्थित थे, इसलिए स्वामी जी हमारे आग्रह को मानकर वशीकरण, सम्मोहन तथा त्राटक के चमत्कार को दिखाने के लिए राज़ी हो गए।
आज हम स्वामी जी द्वारा बताए गए वशीकरण विद्या के विषय में आपको थोड़ी जानकारी देंगे। स्वामी जी तंत्र साधना को केवल सर्वजन हिताय के लिए ही इस्तेमाल करने के पक्ष में थे। उनका मानना था कि वशीकरण विद्या का भूलकर भी स्वहित के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे एक तो यह सिद्धि नष्ट हो जाती है, दूसरे इससे अनावश्यक रूप से भ्रम फ़ैलता है। इसके साथ ही इसका स्वहित के लिए प्रयोग स्वयं के लिए हानिकारक भी सिद्ध हो सकता है।

स्वामी जी ने मार्कण्डेय पुराण के सप्तशती अध्याय में मौजूद “सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्” के द्वारा वशीकरण विद्या सिद्ध की थी। यह मंत्र अर्ध तांत्रिक व अर्ध दैवीय है। इसका प्रभाव भी काफी लंबे समय तक बना रहता है। किंतु इसका स्वार्थ के लिए प्रयोग अनर्थकारी है।

इस विद्या के बारे में विस्तार से बताने से पूर्व हम आपसे केवल अपने साथ हुए वशीकरण प्रयोग की ही चर्चा करेंगे। इसके अगले भाग में इससे रिलेटेड तथ्यात्मक जानकारी साझा की जाएगी।

स्वामी जी ने अति आग्रह करने के बाद हमें चिता भूमि पर बैठाया तथा लगभग पंद्रह मिनट तक कुछ खास मंत्रोच्चारण करते रहे। इसके बाद उन्होंने हमें गंगा में उतरने का आदेश दिया। हम वशीभूत थे और गंगा में उतर गए। लगभग एक घंटा गंगा की धारा में रहने के पश्चात उन्होंने हमें बाहर निकलने का आदेश दिया। जब हम वापस आकर आसन पर बैठे तो उन्होंने वशीकरण हटा लिया। हमें वाकई स्वयं पर आश्चर्य हो रहा था कि कैसे हम उस अत्याधिक ठंढ से भरे गंगा की धारा में एक घंटे तक अविचल खड़े रहे और हमें कोई परेशानी भी नहीं हुई।

In the last article we talked about the mentality of modern youth. Since it was a topical issue and we talked about so many youth had to raise the issue. But today we will discuss about meditation experiments strung them, which we did research themselves and their experiences of men who are proven for many years engaged in a practice out of sight of the world for the good of the world new siddhis are working to achieve.



Today, nearly fourteen years ago, we understand the mystery of Tantric practice Manikarnika Ghat (Varanasi) did. There we were met by such accomplished yogis, without whom we could not affected. Although we had no idea of self accomplishment many queries were still in mind, whose confirmation had to move on to the cremation ground at night.



At that time, a perfect man met Swami Yogananda was a memorable experience with them while some were absolutely divine. Mesmerism, hypnotism and the simple use of Tratk left hand was a game for them. In addition, even though the action was an Swami Maaran and astriction but we urged him only spell, hypnosis and tell us about Tratk.



Incidentally, at the time we were present with our best friend and perfected yogi atmanand, so Swami captivate accepting our request, hypnosis and agreed to show the wonders of Tratk.

Today we reported Swamiji will captivate you some background on the subject of lore. Swami system used for cultivation in favor of the Mass were Hitai. He believed that the subjugation of knowledge should not forget it is also used for self-interest so it is proving to be destroyed, the other is it expands unnecessary confusion. In addition to the use of self-interest can prove harmful to themselves.



Swamiji Sptsti Markandeya Purana chapter of the "proven Kunjika Stotrm" was proven by the spell lore. This spell is half witch and half divine. The effect lasts much longer. But it is disastrous for selfish use.



Description about the lore before we will discuss only with the use of the spell. Related factual information that will be shared in the next section.



After this request Swamiji pyre we put on the ground and continued to chant something about fifteen minutes. He then ordered us to go into the Ganges. We were subjugated and went down in the river. After nearly an hour in the Ganga, he ordered us to get out. When we sat on the back seat, he lifted the spell. We were really surprised at how we ourselves too full of frost, stood motionless for an hour in the Ganga and we did not have any trouble.
Gata ālēkha mēṁ hamanē ādhunika yuvā'ōṁ kī mānasikatā kē bārē mēṁ carcā kī thī. Cūṅki yē ēka sāmayika muddā thā aura hamanē ka'ī yuvā'ōṁ sē isa bārē mēṁ bāta kī thī isali'ē aisē muddē kō uṭhānā zarūrī thā. Kintu āja hama sādhanā kē una anubhūta prayōgōṁ kē bārē mēṁ carcā karēṅgē, jina para hamanē svayaṁ bhī risarca kiyā tathā una sid'dha puruṣōṁ kē anubhavōṁ kō dēkhā jō ka'ī varṣōṁ sē aisī sādhanā mēṁ lipta haiṁ aura duniyā kī nazarōṁ sē ōjhala hōkara duniyā kī bhalā'ī kē li'ē na'ī-na'ī sid'dhiyāṁ prāpta karanē mēṁ juṭē haiṁ.



Āja sē karība caudaha sāla pūrva hama tāntrika sādhanā kē rahasya kō samajhanē kē li'ē maṇikarṇikā ghāṭa (vārāṇasī) jātē thē. Vahāṁ hamārī mulākāta kucha aisē sid'dha yōgiyōṁ sē hu'ī, jinasē hama prabhāvita hu'ē binā nahīṁ raha sakē. Hālāṅki hamanē svayaṁ sid'dhi kē li'ē kō'ī vicāra nahīṁ kiyā thā phira bhī mana mēṁ ka'ī jijñāsā'ēṁ thīṁ, jinakī puṣṭi kē li'ē rātrikāla mēṁ śmaśāna bhūmi para kadama rakhanā hī paṛā.



Tatkālīna samaya mēṁ svāmī yōgānanda nāmaka sid'dha puruṣa sē mulākāta smaraṇīya rahā aura unakē sātha kucha aisē anubhava hu'ē jō bilkula alaukika thē. Vaśīkaraṇa, sam'mōhana tathā trāṭaka kā sādhāraṇa prayōga unakē li'ē bā'ēṁ hātha kā khēla thā. Hālāṅki isakē alāvā svāmī jī māraṇa aura stambhana kriyā kē bhī viśēṣajña thē kintu hamanē unasē āgraha kiyā ki vē kēvala vaśīkaraṇa, sam'mōhana tathā trāṭaka kē viṣaya mēṁ hī hamēṁ batā'ēṁ.



Sanyōga sē usa samaya vahāṁ hamārē sātha hamārē parama mitra aura sid'dha yōgī ātmānanda bhī upasthita thē, isali'ē svāmī jī hamārē āgraha kō mānakara vaśīkaraṇa, sam'mōhana tathā trāṭaka kē camatkāra kō dikhānē kē li'ē rāzī hō ga'ē.

Āja hama svāmī jī dvārā batā'ē ga'ē vaśīkaraṇa vidyā kē viṣaya mēṁ āpakō thōṛī jānakārī dēṅgē. Svāmī jī tantra sādhanā kō kēvala sarvajana hitāya kē li'ē hī istēmāla karanē kē pakṣa mēṁ thē. Unakā mānanā thā ki vaśīkaraṇa vidyā kā bhūlakara bhī svahita kē li'ē istēmāla nahīṁ karanā cāhi'ē kyōṅki isasē ēka tō yaha sid'dhi naṣṭa hō jātī hai, dūsarē isasē anāvaśyaka rūpa sē bhrama failatā hai. Isakē sātha hī isakā svahita kē li'ē prayōga svayaṁ kē li'ē hānikāraka bhī sid'dha hō sakatā hai.



Svāmī jī nē mārkaṇḍēya purāṇa kē saptaśatī adhyāya mēṁ maujūda “sid'dha kun̄jikā stōtram” kē dvārā vaśīkaraṇa vidyā sid'dha kī thī. Yaha mantra ardha tāntrika va ardha daivīya hai. Isakā prabhāva bhī kāphī lambē samaya taka banā rahatā hai. Kintu isakā svārtha kē li'ē prayōga anarthakārī hai.



Isa vidyā kē bārē mēṁ vistāra sē batānē sē pūrva hama āpasē kēvala apanē sātha hu'ē vaśīkaraṇa prayōga kī hī carcā karēṅgē. Isakē agalē bhāga mēṁ isasē rilēṭēḍa tathyātmaka jānakārī sājhā kī jā'ēgī.



Svāmī jī nē ati āgraha karanē kē bāda hamēṁ citā bhūmi para baiṭhāyā tathā lagabhaga pandraha minaṭa taka kucha khāsa mantrōccāraṇa karatē rahē. Isakē bāda unhōnnē hamēṁ gaṅgā mēṁ utaranē kā ādēśa diyā. Hama vaśībhūta thē aura gaṅgā mēṁ utara ga'ē. Lagabhaga ēka ghaṇṭā gaṅgā kī dhārā mēṁ rahanē kē paścāta unhōnnē hamēṁ bāhara nikalanē kā ādēśa diyā. Jaba hama vāpasa ākara āsana para baiṭhē tō unhōnnē vaśīkaraṇa haṭā liyā. Hamēṁ vāka'ī svayaṁ para āścarya hō rahā thā ki kaisē hama usa atyādhika ṭhaṇḍha sē bharē gaṅgā kī dhārā mēṁ ēka ghaṇṭē taka avicala khaṛē rahē aura hamēṁ kō'ī parēśānī bhī nahīṁ hu'ī.

 गत लेख में हमने आधुनिक युवाओं की मानसिकता के बारे में चर्चा की थी। चूंकि ये एक सामयिक मुद्दा था और हमने कई युवाओं से इस बारे में बात की थी इसलिए ऐसे मुद्दे को उठाना ज़रूरी था। किंतु आज हम साधना के उन अनुभूत प्रयोगों के बारे में चर्चा करेंगे, जिन पर हमने स्वयं भी रिसर्च किया तथा उन सिद्ध पुरुषों के अनुभवों को देखा जो कई वर्षों से ऐसी साधना में लिप्त हैं और दुनिया की नज़रों से ओझल होकर दुनिया की भलाई के लिए नई-नई सिद्धियां प्राप्त करने में जुटे हैं। आज से करीब चौदह साल पूर्व हम तांत्रिक साधना के रहस्य को समझने के लिए मणिकर्णिका घाट (वाराणसी) जाते थे। वहां हमारी मुलाकात कुछ ऐसे सिद्ध योगियों से हुई, जिनसे हम प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। हालांकि हमने स्वयं सिद्धि के लिए कोई विचार नहीं किया था फिर भी मन में कई जिज्ञासाएं थीं, जिनकी पुष्टि के लिए रात्रिकाल में श्मशान भूमि पर कदम रखना ही पड़ा। तत्कालीन समय में स्वामी योगानंद नामक सिद्ध पुरुष से मुलाकात स्मरणीय रहा और उनके साथ कुछ ऐसे अनुभव हुए जो बिल्कुल अलौकिक थे। वशीकरण, सम्मोहन तथा त्राटक का साधारण प्रयोग उनके लिए बाएं हाथ का खेल था। हालांकि इसके अलावा स्वामी जी मारण और स्तम्भन क्रिया के भी विशेषज्ञ थे किंतु हमने उनसे आग्रह किया कि वे केवल वशीकरण, सम्मोहन तथा त्राटक के विषय में ही हमें बताएं। संयोग से उस समय वहां हमारे साथ हमारे परम मित्र और सिद्ध योगी आत्मानंद भी उपस्थित थे, इसलिए स्वामी जी हमारे आग्रह को मानकर वशीकरण, सम्मोहन तथा त्राटक के चमत्कार को दिखाने के लिए राज़ी हो गए। आज हम स्वामी जी द्वारा बताए गए वशीकरण विद्या के विषय में आपको थोड़ी जानकारी देंगे। स्वामी जी तंत्र साधना को केवल सर्वजन हिताय के लिए ही इस्तेमाल करने के पक्ष में थे। उनका मानना था कि वशीकरण विद्या का भूलकर भी स्वहित के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे एक तो यह सिद्धि नष्ट हो जाती है, दूसरे इससे अनावश्यक रूप से भ्रम फ़ैलता है। इसके साथ ही इसका स्वहित के लिए प्रयोग स्वयं के लिए हानिकारक भी सिद्ध हो सकता है। स्वामी जी ने मार्कण्डेय पुराण के सप्तशती अध्याय में मौजूद “सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्” के द्वारा वशीकरण विद्या सिद्ध की थी। यह मंत्र अर्ध तांत्रिक व अर्ध दैवीय है। इसका प्रभाव भी काफी लंबे समय तक बना रहता है। किंतु इसका स्वार्थ के लिए प्रयोग अनर्थकारी है। इस विद्या के बारे में विस्तार से बताने से पूर्व हम आपसे केवल अपने साथ हुए वशीकरण प्रयोग की ही चर्चा करेंगे। इसके अगले भाग में इससे रिलेटेड तथ्यात्मक जानकारी साझा की जाएगी। स्वामी जी ने अति आग्रह करने के बाद हमें चिता भूमि पर बैठाया तथा लगभग पंद्रह मिनट तक कुछ खास मंत्रोच्चारण करते रहे। इसके बाद उन्होंने हमें गंगा में उतरने का आदेश दिया। हम वशीभूत थे और गंगा में उतर गए। लगभग एक घंटा गंगा की धारा में रहने के पश्चात उन्होंने हमें बाहर निकलने का आदेश दिया। जब हम वापस आकर आसन पर बैठे तो उन्होंने वशीकरण हटा लिया। हमें वाकई स्वयं पर आश्चर्य हो रहा था कि कैसे हम उस अत्याधिक ठंढ से भरे गंगा की धारा में एक घंटे तक अविचल खड़े रहे और हमें कोई परेशानी भी नहीं हुई।

No comments:

Post a Comment